एक ग़ज़ल : चलो छोड़ देंगे......
चलो छोड़ देंगे क़राबत की बातें
मगर कैसे छूटेंगी उल्फ़त की बातें ?
ये तर्क-ए-मुहब्बत की बातें ,ख़ुदाया !
क़यामत से पहले क़यामत की बातें
कहाँ ज़िन्दगानी में मिलता है कोई
जो करता हो दिल से रफ़ाक़त की बातें
कभी आस्माँ से उतर आइए तो
करेंगे ज़मीनी हक़ीक़त की बातें
जिसे गुफ़्तगू का सलीक़ा नहीं है
वो ही कर रहा है ज़हानत की बातें
अजी !छोड़िए भी यह शिकवा शिकायत
कहीं बैठ करते है राहत की बातें
अरे! रिन्द "आनन" को क्या हो गया है!
कि ज़ाहिद से करता है जन्नत की बातें
-आनन्द
क़्रराबत =समीपता ,साथ-साथ उठना बैठना
तर्क-ए-मुहब्बत= मुहब्बत छोड़ना
रफ़ाकत =दोस्ती
रिन्द =मद्दप/शराबी
4 comments:
बहुत सुंदर गजल जी, धन्यवाद
सुंदर प्रस्तुती के लिए आनंद ही जी को धन्यवाद.
आ० भाटिया जी/काजल कुमार जी
उत्साह वर्धन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद
सादर
आनन्द.पाठक
Vah kia baat kahee hai aap ne....
जिसे गुफ़्तगू का सलीक़ा नहीं है
वो ही कर रहा है ज़हानत की बातें.....
जिन्हें बोलना चाहिए वह खामोश हो जाते हैं जिन्हे खामोश होना चाहिए वह बोले जाते हैं कहने वाले सही कह गये 'थोथा चना बाजे घना'........
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