गीत : जब देहरी को ....
जब देहरी को ठुकरा कर ही जाना है
फिर बोलो वन्दनवार सजा कर क्या होगा ?
आँखों के नेह निमन्त्रण की प्रत्याशा में
पावन आँचल के छाँवों की अभिलाषा में
हर बार गईं ठुकराई मेरी मनुहारें-
हर बार ज़िन्दगी कटी शर्त की भाषा में
जब अँधियारों की ही केवल सुनवाई हो
फिर वहाँ रोशनी की बातें कर क्या होगा ?
तुम निष्ठुर हो ,तुम प्रणय समर्पण क्या जानो !
दो अधरों की चिर-प्यास भला तुम क्या जानो !
क्यों मेरा पूजन-अर्चन तुमको आडम्बर ?
हर पत्थर में देवत्व छुपा तुम क्या जानो !
जब पूजा के थाल छोड़ उठ जाना ,प्रियतम !
फिर अक्षत-चन्दन ,दीप जला कर क्या होगा ?
मेरी गीता के श्लोक तुम्हें क्यों व्यर्थ लगे ?
मेरे गीतों के दर्द तुम्हें असमर्थ लगे
जीवन-वेदी मिट्टी की बनी है मेरी
क्यों तुमको ठोकर लगे ,तुम्हें अभिशप्त लगे?
जब हवन-कुण्ड की ज्योति जली बुझ जानी है
फिर ऋचा मन्त्र से आवाहन कर क्या होगा !
जब देहरी को ठुकरा कर .............
-आनन्द
6 comments:
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सुशील गंगवार
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होगा। नैराश्य का भाव ठीक नहीं है। मृत्यु सुनिश्चित है,यह सोचकर जीवन की अनदेखी ठीक न होगी। जिस दिन सपने मरे,समझिए,जीवन व्यर्थ हुआ। जीवन इस होने न होने के बोध से बहुत आगे जाता है।
अशा ही जीवन है। निराशा ही मृत्यू है। लेकिन रचना कहें तो सुन्दर शब्द संयोजन है। आभार।
बेहद गहन भाव लिए हुए है साडी पंक्तियाँ!
आ0 सुशील गंगवार जी/राधा रमण जी/कपिला जी/वन्दना जी
गीत की सराहना के लिए आप लोगों का बहुत-बहुत
धन्यवाद
सादर
आनन्द.पाठक
बहुत दिन हो गए आपकी पिछली पोस्ट आए। माना,कि हंसाना बहुत मुश्किल है,पर आपका तो असली हुनर यही है।
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