एक ग़ज़ल : जब से उनकी आत्मा है मर गई......
जब से उनकी आत्मा है मर गई
उनके घर उनकी तिजोरी भर गई
चन्द रोटी से जुड़ी मजबूरियाँ
रात ’कोठी" वो गई अक्सर गई
जब ’रपट’ थाने लिखाने को गई
फिर न "छमिया" बाद अपने घर गई
फूल हों कलियाँ कि सब सहमी हुई
जब से माली की नज़र उन पर गई
लाश पर वो रोटियाँ सेंका किए
आदमी की आदमीयत मर गई
हादसे में मरने वाले मर गए
देख-सुन सरकार अपने घर गई
-आनन्द
1 comments:
लाश पर वो रोटियाँ सेंका किए
आदमी की आदमीयत मर गई..
bahut khoob
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